© 2021 Gaurav J. Pathania. This is an open access article distributed under the terms of the Creative Commons Attribution License, which permits unrestricted use, distribution, and reproduction in any medium, provided the original author(s) and source are credited. Forum CASTE: A Global Journal on Social Exclusion Vol. 2 No. 2 pp. 379–380 October - November 2021 ISSN 2639-4928 brandeis.edu/j-caste https://doi.org/10.26812/caste.v2i2.288 1Center for Justice and Peacebuilding, Eastern Mennonite University, Harrisonburg, Virginia E-mail: jogijnu@gmail.com "प्रितिबम्ब" पैनी दृिष्ट से देखो या आँखें फाड़कर िफर भी आसमान में िसफर् दो ही तरह के बादल िदखाई देते हैं एक: हाथी की तरह िवशालकाय लेिकन टुकड़ों में बँटे आसमान के कोने में दुबके हुए से, िछतर ेहुए से काले बादल दूसर:े शेर, बत्तख, चूह,े िचिड़या, गाए और बंदर जैसी आकृित वाले रुई जैसे मुलायम, पूर ेआसमान में फैले हुए सफ़ेद बादल ! ......पृथ्वी पर जब भी हाहाकार मचती ह ै तो सफ़ेद बादल हवा से घबराकर कहीं दूर भाग जातें हैं पर एन मौके पर, हजारों टुकड़े िमलकर बने “काले बादल” फुतीर् से भागते हुए, गरजते हुए, पानी से लबालब खूब जमकर बरसते हैं और प्यासी धरती को एक लम्बे समय के िलए तृप्त कर देते हैं। . . . पर पृथ्वी पर रहने वालों को न जाने क्यों तृिप्त के बाद आसमान में िसफर् सफ़ेद बादल देखना ही अच्छा लगता ह ै और अनंत आसमान के कोने कोने में िफर से सफ़ेद बादल छा जाता ह ै काला बादल न जाने कहाँ छुपा िदया जाता ह ै जब मैं आसमान में उस काले बादल को खोजने की कोिशश करता हँू तो सफ़ेद बादलों की आँख-िमचोली में मुझे ख़ोट सा लगता ह ै िफर मुझे पूरा आसमान पृथ्वी का ही “प्रितिबम्ब” सा लगता ह।ै -------- ------------ ----------- ------------ ------------ ----------- Below is the English transla>on: 1 "प्रितिबम्ब" पैनी दृिष्ट से देखो या आँखें फाड़कर िफर भी आसमान में िसफर् दो ही तरह के बादल िदखाई देते हैं एक: हाथी की तरह िवशालकाय लेिकन टुकड़ों में बँटे आसमान के कोने में दुबके हुए से, िछतर ेहुए से काले बादल दूसर:े शेर, बत्तख, चूह,े िचिड़या, गाए और बंदर जैसी आकृित वाले रुई जैसे मुलायम, पूर ेआसमान में फैले हुए सफ़ेद बादल ! ......पृथ्वी पर जब भी हाहाकार मचती ह ै तो सफ़ेद बादल हवा से घबराकर कहीं दूर भाग जातें हैं पर एन मौके पर, हजारों टुकड़े िमलकर बने “काले बादल” फुतीर् से भागते हुए, गरजते हुए, पानी से लबालब खूब जमकर बरसते हैं और प्यासी धरती को एक लम्बे समय के िलए तृप्त कर देते हैं। . . . पर पृथ्वी पर रहने वालों को न जाने क्यों तृिप्त के बाद आसमान में िसफर् सफ़ेद बादल देखना ही अच्छा लगता ह ै और अनंत आसमान के कोने कोने में िफर से सफ़ेद बादल छा जाता ह ै काला बादल न जाने कहाँ छुपा िदया जाता ह ै जब मैं आसमान में उस काले बादल को खोजने की कोिशश करता हँू तो सफ़ेद बादलों की आँख-िमचोली में मुझे ख़ोट सा लगता ह ै िफर मुझे पूरा आसमान पृथ्वी का ही “प्रितिबम्ब” सा लगता ह।ै -------- ------------ ----------- ------------ ------------ ----------- Below is the English transla>on: 1 Gaurav J. Pathania1 380 CASTE: A Global Journal on Social Exclusion Vol. 2, No. 2 “Reflection” You may see With piercing eyes Or give a cursory look That spread of sky Holds two types of clouds Ones are huge Elephant-like, fragmented framed In corners obscure Others are small Acquiring myriad shapes Sparrows, rabbits, cows and ducks Cottony-soft in sheety-space When the earth cries and clamours White clouds shake and shatter. While the black ones Drench the ground With satiating showers As the earth settles After the quenched thirst The white clouds gather Their privileged feathers The Black clouds hide In their invisible hyde Up they see and say How beautiful the sky is laid With cosmetic decoratives No one sees those Who dared to deliver Who volunteered to do How come they remain unappreciated And their authentic acts go unnoticed? 2 “Reflection” You may see With piercing eyes Or give a cursory look That spread of sky Holds two types of clouds Ones are huge Elephant-like, fragmented framed In corners obscure Others are small Acquiring myriad shapes Sparrows, rabbits, cows and ducks Cottony-soft in sheety-space When the earth cries and clamours White clouds shake and shatter. While the black ones Drench the ground With satiating showers As the earth settles After the quenched thirst The white clouds gather Their privileged feathers The Black clouds hide In their invisible hyde Up they see and say How beautiful the sky is laid With cosmetic decoratives No one sees those Who dared to deliver Who volunteered to do How come they remain unappreciated And their authentic acts go unnoticed? 2 Translation: The poem was originally written in Hindi in 2003. The author is grateful to Dr. Meenu Bhaskar, and Dr. Kalyani K. (JNU) for the English translation.